उसने कहा था — रुको। बस रुको। हिलो मत, बोलो मत, कुछ मत करो।
जब वह आगे झुकी, रसोई का स्लैब उसकी हथेलियों तले ठंडा था। और उसने देखा — ठीक-ठीक देखा — कि उसने क्या सोचकर रखा था। रात का कौन-सा हिस्सा सब्र से काटना था।
इससे बुरे वक़्त में भी, कम के लिए भी, वह सब्र कर चुका था। उस सितंबर की रात तीन बजे खुला गैराज का दरवाज़ा। वह तरीका जिससे वह हमेशा वहाँ रुकती थी जहाँ कहानी चुभने वाली थी। वे चार महीने जो उसने सोचने में लगाए — कि लौटेगी या नहीं — और वे आठ सेकंड जिनमें उसने तय किया कि हाँ।
तीन बटन खुले — तब उसने उसका नाम लिया। वह हमेशा उसका नाम ऐसे लेती थी जैसे किसी ऐसे सवाल का जवाब दे रही हो, जो पूछने की हिम्मत उसे कभी नहीं हुई।
वह नहीं हिला। उसने एक शब्द नहीं कहा।
उसे रुकने के लिए कहा गया था।
