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आज रात की रचनाप्रतीक्षा1 मिनट

बगीचे का दरवाज़ा

A woman with copper red hair in a black evening dress unzipped low down her bare back turns into a man in an open dinner shirt at the rail of a dark terrace, her mouth at his, his hand at the small of her back, party light spilling through the glass door behind them.
The whole thing is this.

संगीत अभी भी कांच के दरवाज़े से सुनाई दे रहा था — कम, पृष्ठभूमि में, जो किसी को सुने बिना ही कमरे को भर देता है। वह पहले बाहर निकल गई थी। वह पीछे आया था, क्योंकि वह तो आता ही था।

वे छत के किनारे पर खड़े थे, एक दूसरे को छुए बिना, कहीं को न देखते। नीचे का बाग़ अंधेरे में था। ऊपर आसमान शहर की रात का वह रंग था जिसका कोई नाम नहीं।

वह अपने कंधे और उसकी बाँह के बीच की दूरी से पूरी तरह सचेत थी।

वह बाहर आने के बाद से कुछ नहीं बोला था। वह पाई कि वह इससे ख़ुश थी। शब्द इसे कुछ ऐसा बना देते जिसे तय करना पड़ता। एक मिनट बीत गया। शायद दो।

उसने अपना सिर बस थोड़ा घुमाया — उसे देखने के लिए नहीं, बस उसकी ओर, एक चौथाई-डिग्री का बदलाव जो सब कुछ था और कुछ नहीं भी। उसने महसूस किया। वह जानती थी कि उसने महसूस किया।

"हमें वापस अंदर चले जाना चाहिए," वह बोली।

"चाहिए," वह सहमत हुआ।

कोई नहीं हिला।

अंदर संगीत बदल गया, कुछ ज़्यादा बेस वाला, और उसने किसी को हँसते सुना — ऊँची और लापरवाह हँसी, उन लोगों की आवाज़ जो नहीं जानते कि उनसे ईष्या की जा रही है।

उसने सोचा: अगले पल में हम में से एक मुड़ जाएगा। उसने सोचा: काश वह हो। उसने सोचा: मुझे तो बहुत चाहिए कि वह हो।

रात की हवा उसकी हँसली पर ठंडी थी। वह बस-बस अपना वजन बदलता है, अब उसकी बाँह उसकी साँसों से सिर्फ़ एक साँस दूर।

यह, वह सोचा। यह वही है। सारी बात बस यही है।