ट्रेन एक घंटे से देरी से थी जब वह उसके सामने बैठ गई।
वह एक ऐसी किताब पढ़ रही थी जिससे उसे प्रेम था। उसने पहले किताब का मुखपृष्ठ पहचाना, फिर उसे। फिर उसे।
वे कभी नहीं मिले थे।
"दूसरा हिस्सा पढ़ने लायक है?" उसने पूछा।
उसने नज़र नहीं उठाई। "जब पहुँच जाऊँगी, बताऊँगी।"
"कब पहुँचोगी?"
"अटलांटा।"
"मैं भी अटलांटा में उतरता हूँ।"
उसने अंगूठे से पन्ना दबाया और नज़र उठाई। पूरी ट्रेन उसके फ़ैसले के इर्द-गिर्द फिर से सज गई।
"तो अटलांटा में बताऊँगी," उसने कहा।
