उसे अपनी ड्रेस खिड़की के बगल की कुर्सी पर मिली। उसे उठाते देख रहा था वह — सहज ढंग से, जैसे कोई औरत किसी परिचित जगह से कोई चीज़ उठा लेती है — और उसके अंदर कुछ शांत हो गया।
वह तब से नहीं हिला जब से उसकी नींद खुली थी। अब भी नहीं हिला।
उसने ड्रेस को झटका दिया और अपनी पहन ली। वह उसकी पीठ को देख रहा था, उसकी रीढ़ की लाइन। ज़िप वह ख़ुद खींच रही थी। लगभग पूरा।
'तुम सो गईं,' उसने कहा। वह कुछ कहना नहीं चाहता था।
वह घूम गई। रोशनी उसकी आँखों में पड़ी। 'हाँ,' वह बोली, जैसे वह भी यह हैरानी से सुन रही हो।
वह कहना चाहता था: रुको। उसने कहा: 'कॉफ़ी है।'
उसने इस बात पर विचार किया। वह उसके चेहरे पर छोटा-सा हिसाब देख सकता था — तराज़ू झूलता हुआ, सब कुछ दोबारा सँभलता हुआ। वह बिस्तर की किनारे बैठ गई, जहाँ वह पहले थी। छूने के लिए एकदम पास नहीं। ड्रेस की पीठ अभी भी खुली थी।
'सिर्फ़ कॉफ़ी,' उसने कहा।
'सिर्फ़ कॉफ़ी,' उसने भी कहा।
दोनों जानते थे कि यह झूठ था। लेकिन उस मेहरबानी को वैसे ही रहने दिया, जैसे बड़े लोग करते हैं जब सुबह को एक झूठ की ज़रूरत पड़ती है और उसे न देने का कोई अच्छा कारण न हो।
वह रसोई चली गई। उसने उसे चीज़ें ढूंढते सुना: अलमारी, डिब्बा, दराज़। वह इस तरह चलती थी मानो वह जानती हो कि सब कुछ कहाँ है, या शायद जानने की कोई फ़िक्र न हो। कुछ औरतें ऐसी ही होती हैं।
जब गंध आई तो वह उठ गया। रोशनी बदल गई थी। दरवाज़े पर खड़े होकर देखा — वह काउंटर पर थी, उसकी पीठ उसकी ओर, ड्रेस अभी खुली थी, और उसने सोचा: यह याद रखूँगा। रोशनी की बिल्कुल यही गुणवत्ता। वह आवाज़ जो उसने निकाली जब उसे सही दराज़ मिल गया।
'मग्स?' उसने कहा। वह घूमी नहीं थी।
'ऊपर,' उसने कहा।