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संग्रहअगली सुबह1 मिनट

सुबह

A woman in a man's loose white shirt slipping off one shoulder, holding a glass coffee pot over two white cups on a table and looking at a bare-chested man seated across from her, hard morning light falling across them and the kitchen dark behind.
She wore his shirt and nothing under it.

वह उसकी रसोई में कॉफ़ी बना रही थी जैसे वहीं रहती हो।

शायद रहती थी। शायद हमेशा से। शायद अपार्टमेंट उसका इंतज़ार कर रहा था — जैसे बिस्तर करता था। धैर्यवान, आधा गर्म, उसके बिना कभी पूरा नहीं।

उसने उसकी कमीज़ पहनी थी और नीचे कुछ नहीं। वह देख रहा था कि वह कॉफ़ी के दाने उसी सटीकता से नाप रही है जिससे वह होंठों पर लिपस्टिक लगाती थी — जब कुछ ख़ास कहना होता था।

"रुको," उसने कहा।

"मैं यहाँ हूँ।"

"और रुको।"

वह मुड़ी, सुबह की रोशनी उसे दो हिस्सों में काटती हुई। "कितना और?"

"सब।"

उसने जवाब नहीं दिया। बस दो कप भर दिए।