वह उसकी रसोई में कॉफ़ी बना रही थी जैसे वहीं रहती हो।
शायद रहती थी। शायद हमेशा से। शायद अपार्टमेंट उसका इंतज़ार कर रहा था — जैसे बिस्तर करता था। धैर्यवान, आधा गर्म, उसके बिना कभी पूरा नहीं।
उसने उसकी कमीज़ पहनी थी और नीचे कुछ नहीं। वह देख रहा था कि वह कॉफ़ी के दाने उसी सटीकता से नाप रही है जिससे वह होंठों पर लिपस्टिक लगाती थी — जब कुछ ख़ास कहना होता था।
"रुको," उसने कहा।
"मैं यहाँ हूँ।"
"और रुको।"
वह मुड़ी, सुबह की रोशनी उसे दो हिस्सों में काटती हुई। "कितना और?"
"सब।"
उसने जवाब नहीं दिया। बस दो कप भर दिए।