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संग्रहपुरानी लौ1 मिनट

आख़िरी डिब्बा

A woman in a peach silk slip with one strap fallen and a man in an open white shirt standing inches apart and facing each other without touching in an emptied room, a bare bulb burning overhead and an open cardboard box on the bare floor beside them.
Neither of them took it.

एक डिब्बा बचा था।

दोनों जानते थे कि बात कभी डिब्बे की थी ही नहीं — वह तीन हफ़्ते से गलियारे की अलमारी में पड़ा था, एक बहाना, एक काम, एक धागा जिसे साफ़ काट देने की हिम्मत किसी में नहीं हुई थी।

वह मंगलवार को आई, क्योंकि मंगलवार का मतलब था कि वह घर पर होगा। उसने दरवाज़ा यूँ खोला जैसे पीछे ही खड़ा रहा हो।

अपार्टमेंट उसकी याद से ज़्यादा ख़ाली था, और इसी वजह से ज़्यादा शोर भरा। हर वह आवाज़ जो उन्होंने नहीं की, कमरों में भर गई।

"अलमारी में है," उसने कहा।

"मुझे पता है कहाँ है।"

उसे पता था। उसे पता था कौन-सी फ़र्श की पट्टी चरमराती है, कौन-सा बटन अटकता है, बिस्तर का कौन-सा हिस्सा पहले ठंडा पड़ता है। वह इस जगह को यूँ जानती थी जैसे कोई उस गाने को जानता है जिसे न बजाने का फ़ैसला वह कर चुका हो।

वह अलमारी की ओर नहीं बढ़ी।

"तो ले लो," उसने कहा। वह भी नहीं हिला।

किसी ने भी उसे नहीं उठाया।