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संग्रहपुरानी लौ1 मिनट

एलोवेरा

An East Asian woman with dark hair pinned up loosely sits with her bare back to the camera, holding a white towel against her front, faint pale strap lines across her sun-pinked shoulders. A bare-chested Latino man in loose gray drawstring trousers kneels behind her, one palm flat against her upper back, his mouth near her shoulder, her head tipped forward and her eyes closed. A dim bedroom with a shuttered window behind them lets in the last blue light of dusk.
The bottle, forgotten on the sheet.

उन्नीस साल की शादी, और इतने सालों में हर जून वही किराए की कॉटेज, वही लोहे का पलंग जो दोनों के नीचे चरमराता था, और फिर भी हर एक साल वह रेत पर मुँह के बल सोकर वैसी ही गलती दोहरा देती थी, जो पिछली गर्मी को उसे सिखा देनी चाहिए थी।

वह बाहर तय समय से तीन घंटे ज़्यादा रह गई थी, एक उपन्यास में डूबी हुई जिसे वह असल में पढ़ नहीं रही थी, और भीतर लौटी तो उसका रंग वैसा था जैसे कोई चीज़ ओवन में बहुत देर तक भूल दी गई हो, उसके हरे स्विमसूट की पट्टियों का सफ़ेद निशान उसके कंधों पर किसी तस्वीर के निगेटिव जैसा छपा था।

उसे एलोवेरा वहीं मिला जहाँ वह हमेशा से रखा रहता था, किसी ऐसे जून से छुआ तक नहीं गया जिसे दोनों में से कोई नाम नहीं दे पाता, ढक्कन नमक से जाम हो चुका था और जेल हर अगस्त की तरह उस फीके, भूतिया हरे रंग का हो चुका था।

"लेट जाओ," उसने उस आवाज़ में कहा जो वह उन बातों के लिए रखता था जो असल में गुज़ारिश नहीं होती थीं, और वह लेट गई, पेट के बल, बोतल खुद अपने हाथ में थामे हुए, क्योंकि खाली हाथों में उसे कोई काम थमाना उन्नीस गर्मियों में कभी काम नहीं आया था।

उसने पहले उसके कंधों पर धीरे-धीरे मलना शुरू किया, पट्टी के छोड़े उस साफ़, फीके निशान के साथ-साथ, और उसने तकिए में एक आवाज़ दबाई जो आधी दर्द थी और आधी कुछ ऐसा जो बहुत पहले दर्द के ठीक बगल में रहना सीख चुका था।

उसे बिना देखे ही वह पूरा नक्शा याद था: हर कंधे पर सफ़ेद पट्टी, गर्दन के पीछे वह गड्ढा जहाँ हर साल धूप पहुँच ही जाती थी चाहे दोनों कुछ भी कर लें, एक कान के पीछे वह छोटा-सा फीका निशान, उस गर्मी की याद जब उसने लगातार दो हफ़्ते बाल ऊपर बाँधे रखे थे।

"एक जगह छूट गई तुमसे," उसने कहा, जब उसके हाथ उसकी पीठ के निचले हिस्से पर थम गए, और एक पल को वह कुछ नहीं बोला, क्योंकि उसकी त्वचा का वह हिस्सा कभी धूप देख ही नहीं पाया था। न उस दिन। न किसी और दिन। न उन्नीस गर्मियों में कभी।

बोतल उसके हाथ से फिसलकर चादर पर जा गिरी, और दोनों में से किसी ने उसे उठाया नहीं। उसकी हथेली ठीक वहीं टिकी रही, सपाट और गर्म, अब धूप की जलन का बहाना किए बिना, जबकि पूरा धुंधला कमरा साँस रोककर देख रहा था कि इन दोनों में से पहले कौन हिलता है।