बारह बरस बाद भी, वह पूछता था।
यही तो था उसमें। दूसरे मर्द पूछना छोड़ देते — या तो मान लेते, या भूल जाते, या जवाब सुनने की चाह ही छोड़ देते। वह हर बार पूछता था, जैसे जवाब बदल गया हो, जैसे रात के खाने और अँधेरे के बीच वह कोई नई औरत बन गई हो।
कभी-कभी बन भी जाती थी।
"अब भी?" उसने कहा। बच्चे दो कमरे आगे थे और आख़िरकार, आख़िरकार चुप।
"अब भी," उसने कहा।
उसका हाथ उसके कंधे के ढलान तक यूँ पहुँचा जैसे कोई बरसों से बसे घर में बटन ढूँढ़ता है — बिना देखे, बिना सोचे, पक्के यक़ीन से।
"तुम्हें यक़ीन है," उसने कहा। इस बार सवाल नहीं। एक बात जो कहना उसे अच्छा लगता था, क्योंकि उसे यह सुनना अच्छा लगता था कि वह यही बात लौटाकर कहे।
"बारह बरस," उसने कहा। "मुझे यक़ीन है।"